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Editors Guild का दोहरा मापदंड फिर से सामने आया है



Editors Guild का दोहरा मापदंड फिर से सामने आया है, जब अन्य किसी भी मीडियाकर्मी पर सरकारें FIR करती है तब वे सहूलियत से चुप्पी सादते है। और जो उनके खेमे की किसी मीडिया कम्पनी पर हल्की आँच आती है तो वे एक सिपाही की तरह बचाव में खड़े हो जाते है। बचाव करिए तो सबका न की कुछ का। Editors Guild को निष्पक्ष होकर, न सरकार का, न चुनिंदा मीडिया हाउस का और न जाँच एजेन्सी पर सिर्फ़ सत्य का ही साथ देना चाहिए। Editors Guild अब देश के सभी मीडिया एवेम सम्पादकों के लिए न रहकर ‘Few Editors’ Guild बन गया है, जो सिलेक्टिव निंदा करती है।

अगर Editors Guild को अपनी विश्वसनीयता बनाए रखनी हो, तो उसे ‘deep concern’ छापेमारी पर नहीं परंतु NDTV पर लगे आरोपों पर होना चाहिए। I agree “Entry of police & other agencies into media offices is serious matter”, इसीलिए उन्हें प्रेस विज्ञप्ति में NDTV से जाँच में सहयोग देने कहना चाहिए।

कुछ महीनों पहले भी NDTV पर एक दिवसीय प्रतिबंध की बात चली थी, फिर एक मीटिंग हुई और सब जानते है की क्या हुआ। शायद इस बार भी कुछ ऐसा ही हो।
अगर NDTV ने कोई भी चूक की हो तो उसमें उचित कार्यवाही करनी चाहिए। और इन आरोपों से NDTV को बचाने के लिए ‘लोकतंत्र पर हमला’ कहना ग़लत है।

मीडिया और सरकार दोनो को एक-दूसरे से डरने की ज़रूरत नहीं। सरकार की हर नीति को जाँचे, प्रश्न करे, बेबाक़ी से पड़ताल करे यही मीडिया का धर्म है। सभी पत्रकारों को निर्भीक हो कर काम करना चाहिए, सरकार एवं सरकार समर्थकों की आलोचना से बेफ़िकर, राष्ट्रहित में पत्रकारीता करनी चाहिए। पहले कोई और सरकार थी, आज कोई दूसरी है और कल शायद कोई और होगी, सरकार हमें जनता की आवाज़ बनने का अधिकार नहीं देती पर दर्शक और समाज देता है। किसी भी मीडिया हाउस को सरकार, जाँच एजेन्सीयों से डरना नहीं चाहिए। सवाल पूछते रहिए और सरकारों को कठघरे में खड़े करते रहिए।



 

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Dr. Subhash Chandra